चौथा स्तंभ
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मीडिया को कहा जाता है, लेकिन क्या वर्तमान में ऐसा कहना उचित है ??
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मीडिया को कहा जाता है, लेकिन क्या वर्तमान में ऐसा कहना उचित है ??
आज जो मीडिया है क्या वो सच में चौथा स्तम्भ है ?
मीडिया आज जनता से कोसो दूर है। कोई राय जानने जनता के पास नहीं जाता है।
मीडिया आज जनता से कोसो दूर है। कोई राय जानने जनता के पास नहीं जाता है।
आज का मिडिया दिल्ली के स्टूडियो से बाहर निकलता नहीं है ,और पूरे भारत का हाल बताने लगता है।
और स्टूडियो में बैठे पार्टियो के प्रवक्ताओ को ही जनता मान लिया जाता है। मीडिया का जनता से संवाद लगभग ख़त्म हो चुका है।
मीडिया आज दो धड़ो में बट चुका है, जो इंडिया और पाकिस्तान के बटवारे से भी ज्यादा खतरनाक है।
इसका नुक्सान सबसे ज्यादा लोकतंत्र की अस्मिता को है , चौथा स्तम्भ लगभग टूट चूका है।
मीडिया के लिए दलाली ,चाटुकारिता जैसे शब्दो का प्रयोग होने लगा है ,जिसमें सच्चाई भी दिखती है की मीडिया व्यक्ति विशेष या सरकार विशेष के लिये पैसे लेके या जिस किसी भी कारन उसके पछ में खबरे चलाता है.
आज न्यूज़ चैनल जन समस्या को लेकर नही टी आर पी के हिसाब से न्यूज़ दिखाते है , आज समाचार टी आर पी का खेल बनकर रह गया है। प्राइम टाइम के समय में न्यूज़ चैनल ४-५ पार्टी प्रवक्ताओ को बैठा लड़ाई करवाते है और एंकर खुद भी चिल्लाता है, चिल पो हल्ला मचाकर न्यूज़ चैनल को किसी मनोरंजक प्रोग्राम की तरह दिखा कर टी आर पी बटोरने में लग जाते है।
भ्रस्टाचार में जेल जा चुके पत्रकार जमानत पर बाहर आ कर भ्रस्टाचार पे ज्ञान दे रहे है। और
देश भक्ति को उकसाकर खुद को देशभक्त बता रहे हैं। इन सब जगह से कोई गायब है तो सिर्फ जनता और उसकी समस्या। कोई जनता को पूछने वाला नहीं है अब खबर प्लांट कराइ जाने लगी है। .
न्यूज़ चैनल खुद को न. 1 बताने में लगे हुए है। और शायद उनके इस न. 1 होने के दावे में लोकतंत्र पीछे छूट गया है .
और लोकतंत्र का यह चौथा स्तम्भ टूट रहा है या बिक रहा है।
लेकिन अभी भी कुछ उम्मीद उन गिने जा सकने वाले पत्रकारों से बाकी है जो ईमानदारी के राह पर चल रहे हैं,
जनता से रूबरू हो रहे है ।
अब आप कुछ लोग ही इस टूटते हुए लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की मरम्मत कर सकते हो।
धन्यवाद
मीडिया आज दो धड़ो में बट चुका है, जो इंडिया और पाकिस्तान के बटवारे से भी ज्यादा खतरनाक है।
इसका नुक्सान सबसे ज्यादा लोकतंत्र की अस्मिता को है , चौथा स्तम्भ लगभग टूट चूका है।
मीडिया के लिए दलाली ,चाटुकारिता जैसे शब्दो का प्रयोग होने लगा है ,जिसमें सच्चाई भी दिखती है की मीडिया व्यक्ति विशेष या सरकार विशेष के लिये पैसे लेके या जिस किसी भी कारन उसके पछ में खबरे चलाता है.
आज न्यूज़ चैनल जन समस्या को लेकर नही टी आर पी के हिसाब से न्यूज़ दिखाते है , आज समाचार टी आर पी का खेल बनकर रह गया है। प्राइम टाइम के समय में न्यूज़ चैनल ४-५ पार्टी प्रवक्ताओ को बैठा लड़ाई करवाते है और एंकर खुद भी चिल्लाता है, चिल पो हल्ला मचाकर न्यूज़ चैनल को किसी मनोरंजक प्रोग्राम की तरह दिखा कर टी आर पी बटोरने में लग जाते है।
भ्रस्टाचार में जेल जा चुके पत्रकार जमानत पर बाहर आ कर भ्रस्टाचार पे ज्ञान दे रहे है। और
देश भक्ति को उकसाकर खुद को देशभक्त बता रहे हैं। इन सब जगह से कोई गायब है तो सिर्फ जनता और उसकी समस्या। कोई जनता को पूछने वाला नहीं है अब खबर प्लांट कराइ जाने लगी है। .
न्यूज़ चैनल खुद को न. 1 बताने में लगे हुए है। और शायद उनके इस न. 1 होने के दावे में लोकतंत्र पीछे छूट गया है .
और लोकतंत्र का यह चौथा स्तम्भ टूट रहा है या बिक रहा है।
लेकिन अभी भी कुछ उम्मीद उन गिने जा सकने वाले पत्रकारों से बाकी है जो ईमानदारी के राह पर चल रहे हैं,
जनता से रूबरू हो रहे है ।
अब आप कुछ लोग ही इस टूटते हुए लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की मरम्मत कर सकते हो।
धन्यवाद
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